स्वागतम

"मेरे अंतर का ज्वार, जब कुछ वेग से उफ़न पड़ता है,
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
साहित्य के क्षेत्र में मेरा ये प्रारंभिक कदम है, अपने टिप्पणियों से मेरा मार्ग दर्शन करें |

रविवार, 8 मार्च 2026

युद्ध और औरत

हर युद्ध लड़ा जाता है,

मर्दों, सरकारों और देशों के बीच 

पर बलिदान, बस देह औरतों की।

मारे जाते बच्चे, मर्द और बूढ़े,

पर हार–जीत की असली कीमत

चुकाती हैं देह औरतों की।


विजय का ईनाम बन बँटती हैं वे,

मानो लूटी हुई कोई जागीर।

विजयी बन जाते हैं गिद्ध,

जो नोचते हैं हर रूह को-

और बिकने को बाजार में 

देह औरतों की।


कहते हैं-मर्दानगी है युद्ध,

पर यह कैसी मर्दानगी है

जिसकी तलवार अंततः

आकर ठहरती है

देह औरतों की।


इतिहास की हर लड़ाई

लड़ी गयी ज़मीं के लिए,

पर रौंदी गयी बार-बार

बस देह औरतों की।


कभी “कम्फर्ट वुमन” कहकर

चुपचाप परोस दी गयीं वे-

आज भी उस इतिहास पर

झिझकता है जापान।


कभी एप्सटीन जैसे अड्डों पर

रसूखदारों की अय्याशियों के बीच

दस्तरखान पर सजी रहती है

चीथड़ों में बदलती

देह औरतों की।


सुना है-किसी को

शांति का नोबेल## मिला है

उन जख्मों को सीने के लिए

जो युद्ध और बलात्कार ने दिए।

पर क्या सचमुच

सिल पाती हैं वे टांके

उन घायल आत्माओं के चीथड़े,

जो बिखर जाते हैं

देह औरतों की?


लड़ी जाती रही है

हर लड़ाई, हर युद्ध—

धधकती रही रणभूमि की राख,

और उसी राख में

बार-बार भस्म होती रही

देह औरतों की।


हर युद्ध लड़ा जाता है,

पर बलिदान बस

देह औरतों की।


## 2018 नोबेल शांति पुरस्कार  


-शशि रंजन मिश्र 'सत्यकाम'
 

(08-03-2026)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें