यादों के दरख्तों पे अरमानों की बुलबुल लेती है जब करवटें,
बागबान भी मचल उठता है मरहलों से गुजरे कारवां की तलाश में |
स्वागतम
"मेरे अंतर का ज्वार, जब कुछ वेग से उफ़न पड़ता है,
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
साहित्य के क्षेत्र में मेरा ये प्रारंभिक कदम है, अपने टिप्पणियों से मेरा मार्ग दर्शन करें |
शनिवार, 7 मार्च 2009
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
मेरी पहचान....

अन्वेषण स्वयं का
जैसे
अनंत शून्य में भटकना
क्या सत्य है मेरा ,
या कोई मिथ्या
अंतरद्वंद या छलावा
मैं बुद्ध नहीं
महावीर भी नहीं हूँ
जो संसार के कष्टों से भाग चलूँ |
नहीं बैठ सकता कंदराओं में ,
वृक्षों के नीचे
और करूँ अन्वेषण
सत्य का
कष्टों से मुक्ति का |
खुद को ही सहेजना
सुलझाने की जगह
जीवन के जटिलता का |
यह अपराध है
जो मैं नहीं कर सकता |
मैं बंद पड़ी गांठों
को खोलता हूँ
अपनी असमर्थ अँगुलियों से |
मेरा सत्य
यहीं बंद है |
मेरे अंतर के माया-जाल
की कुंजी यहीं बंधी है |
बस गांठें खोल लूँ |
मैं ब्रम्ह हूँ
आभास मुझे है
मैं स्वयं सृष्टी हूँ
फिर क्यूँ
ये अंतर्द्वंद
ये विचारों का मंथन ,
कुछ अनुतरित सा हो जाता हूँ |
जब कोई करता है
मेरा अन्वेषण |
रविवार, 2 नवंबर 2008
आवाज़ तुम देना
एक गीत मैं लिखूंगा
आवाज़ तुम देना,
मैं रागों को सजाऊँ
साज़ तुम देना एक ....
जोडेंगे टुकड़े -टुकड़े
हम आज अपने मन के ,
गुन्थेंगे एक सुर में
हर भाव जीवन के
ना हो कभी ख़तम जो
वो शाम तुम देना एक ...
अगर हो जायेंगे मदमस्त
थाम लेना मेरी बाहें,
गर हम भटक गए तो
सुलझाना मेरी राहें ,
तुम अमृत-घट से उंडेल
जाम मुझको देना एक ...
हम मन के नाव खेवें
भावों के इस लहर में ,
हर फिक्र को डुबो दे
यादों के भंवर में
हमें ले जाये जो किनारे
वो मझधार तुम देना एक ...
आवाज़ तुम देना,
मैं रागों को सजाऊँ
साज़ तुम देना एक ....
जोडेंगे टुकड़े -टुकड़े
हम आज अपने मन के ,
गुन्थेंगे एक सुर में
हर भाव जीवन के
ना हो कभी ख़तम जो
वो शाम तुम देना एक ...
अगर हो जायेंगे मदमस्त
थाम लेना मेरी बाहें,
गर हम भटक गए तो
सुलझाना मेरी राहें ,
तुम अमृत-घट से उंडेल
जाम मुझको देना एक ...
हम मन के नाव खेवें
भावों के इस लहर में ,
हर फिक्र को डुबो दे
यादों के भंवर में
हमें ले जाये जो किनारे
वो मझधार तुम देना एक ...
शुक्रवार, 19 सितंबर 2008
अंतर-नाद

इक तान सुना दे मनमीता जो कलुष मन के धो दे ,
बिखरा पड़ा है जीवन मेरा जो एक सूत में उसे पिरो दे
बस एक तान सुना दे मुझको जो झंकृत कर दे मन को ,
मनमीत बहा दे निश्चल प्रेम और निर्मल कर मेरे जीवन को
मेरे मन के ढीले तारों को आज नीज हाथों से तू कस दे,
छेड़ दे ऐसी राग मधुर शायद आज हम फिर से हँस दे
आज मेरी टूटती साँसों में, अपनी ही सांस अमर भर दे,
नासूर बन गए घाव जीवन के तू बस छूकर मरहम कर दे
बुधवार, 3 सितंबर 2008
बारिश और मैं ...
अहसास
फूलों को मुस्कुराने दो
कलियों को खिलखिलाने दो
मुझे तो है बस काँटों से वास्ता
जिनकी चुभन मुझे देती हैं
अहसास फूलों की कोमलता का
उनकी चपलता का
मेरे शरीर से टपकते लहू
बोध कराते हैं मुझे
सुर्ख गुलाब का
मेरी आहों से लगता है
जैसे फूल मुझपे हँसे हों
मेरी बेबसियों पे उनके
ये कहकहे हों
मुझे प्यारी लगती है काँटों की चुभन
जो अंतर-हृदय को सहलाते हैं
मुझे
अपनेपन का अहसास दिलाते हैं.
कलियों को खिलखिलाने दो
मुझे तो है बस काँटों से वास्ता
जिनकी चुभन मुझे देती हैं
अहसास फूलों की कोमलता का
उनकी चपलता का
मेरे शरीर से टपकते लहू
बोध कराते हैं मुझे
सुर्ख गुलाब का
मेरी आहों से लगता है
जैसे फूल मुझपे हँसे हों
मेरी बेबसियों पे उनके
ये कहकहे हों
मुझे प्यारी लगती है काँटों की चुभन
जो अंतर-हृदय को सहलाते हैं
मुझे
अपनेपन का अहसास दिलाते हैं.
सतत् चरैवेति...
मेरे मन तू और बहक
चूमने को आकाश की ऊँचाईयां
देख बौनी होती धरती को
और खोज उसमे अपनी परछाईयां
उड़ता चल पहाड़ों के ऊपर से
वो भी सिर झुका लें
उड़ता चल जंगलों के ऊपर से
वृक्ष भी ईर्ष्या से जल उठें
उड़ता चल सागर के ऊपर से
जो तुम्हें इक बूँद दिखे
मन मेरे तू इतना मचल
आकाश भी छोटा लगे
राह में आंधियां भी आएँगी
तेरी शक्ति को पिघलायेंगी
बादलों के गर्जन संग तुम्हें
चमक चमक डरायेंगी
मन मेरे तू कभी न डर
तू इनसे भी विकराल है
हुंकार भर के आगे बढ़
तू ही तो महाकाल है
पीछे रह जाएँगी
मुश्किलें जो आएँगी
फिर वही आगे बढ़
राह तुझे बतलायेंगी
इसलिए तू बन अविचल
बढ़ता चल
बस बढ़ता चल
चूमने को आकाश की ऊँचाईयां
देख बौनी होती धरती को

और खोज उसमे अपनी परछाईयां
उड़ता चल पहाड़ों के ऊपर से
वो भी सिर झुका लें
उड़ता चल जंगलों के ऊपर से
वृक्ष भी ईर्ष्या से जल उठें
उड़ता चल सागर के ऊपर से
जो तुम्हें इक बूँद दिखे
मन मेरे तू इतना मचल
आकाश भी छोटा लगे
राह में आंधियां भी आएँगी
तेरी शक्ति को पिघलायेंगी
बादलों के गर्जन संग तुम्हें
चमक चमक डरायेंगी
मन मेरे तू कभी न डर
तू इनसे भी विकराल है
हुंकार भर के आगे बढ़
तू ही तो महाकाल है
पीछे रह जाएँगी
मुश्किलें जो आएँगी
फिर वही आगे बढ़
राह तुझे बतलायेंगी
इसलिए तू बन अविचल
बढ़ता चल
बस बढ़ता चल
ग़दर के बाद
(मित्रों हमारे देश ने बहुत सारे जातिगत ग़दर देखें हैं,
फिल्म Bombay के दृश्यों को देखने के बाद कवि हृदय
मचल उठा और ये बानगी कागज़ पर उतरती चली गयी.....)

है शहर खामोश बहुत ही, जरूर कहीं कुछ बात हुई है,
सन्नाटे का है शोर चारों तरफ, क्या अज़ब हालात हुई है |
वीराने बस रहे हैं माय्खानो में, कसक जज्बात हुई है,
और टूटकर बिखरे पैमानों में, दर्दे आह हुई है |
जो भटकते थे कूचों* में दिलेजाना के कभी,
आज क्यूँ उनमे खूने-वह्शियत सवारन हुई है |
जिन झरोखों में परियां कभी दिख जाती थीं,
देखा हर कांच हर कड़ी तबाह हुई है |
है ज़हर ये कैसा सिर्फ वीराने जी रहे हैं,
इंसानियत बदल गयी, कैसी तिलस्मात हुई है |
मचल उठा और ये बानगी कागज़ पर उतरती चली गयी.....)

है शहर खामोश बहुत ही, जरूर कहीं कुछ बात हुई है,
सन्नाटे का है शोर चारों तरफ, क्या अज़ब हालात हुई है |
वीराने बस रहे हैं माय्खानो में, कसक जज्बात हुई है,
और टूटकर बिखरे पैमानों में, दर्दे आह हुई है |
जो भटकते थे कूचों* में दिलेजाना के कभी,
आज क्यूँ उनमे खूने-वह्शियत सवारन हुई है |
जिन झरोखों में परियां कभी दिख जाती थीं,
देखा हर कांच हर कड़ी तबाह हुई है |
है ज़हर ये कैसा सिर्फ वीराने जी रहे हैं,
इंसानियत बदल गयी, कैसी तिलस्मात हुई है |
मंगलवार, 2 सितंबर 2008
आखिरी ख़त...
तेरे आखिरी ख़त के आखिरी पन्ने में कुछ इकरार लिखा है, बिछुड़ रहे हो तुम मुझसे और ज़माने भर का प्यार लिखा है
हर शब्द में पिरोया है तुमने, दिले जज्बात की धड़कन,
और बिखरते अक्षरों में तुम्हारे आसुओं का आयाम लिखा है
बनाया था हमने कभी एक आशियाँ ख्वाबों के जहाँ में,
तुमने उस आशियाने में गुजरे हर सुबह - शाम लिखा है
जला करते थे जिस इश्क की आग में हम मद्धम- मद्धम,
तुमने उस असह्य तपिश को आराम लिखा है
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

