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गुरुवार, 25 जून 2026

लोकाचार के लबेद में निर्जला एकादशी



 लोकाचार के लबेद में निर्जला एकादशी

- शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम’

आज निर्जला एकादशी है। जेठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी। वैसे तो एकादशी बारहों महीने होती है। साल भर में चौबीस एकादशी। लेकिन जेठ की तपती गर्मी और उसमें बिना पानी के उपवास बहुत कठिन होता है, फिर भी इसकी महिमा का बखान खूब हुआ है। स्वर्ग-नरक, धर्म-अधर्म से परे हटकर इस पर्व के पीछे की गूढ़ और गहरी बात समझने और जानने योग्य है। तो आइए, लोकाचार के लबेद के बहाने इस पर्व पर कुछ पढ़ा जाए...

बात तब की है जब मनुष्य सामाजिक दायरे में बंधा। तब पुरखे-पुरनिए, ऋषि-मुनि, साधु-संत सब लोगों ने समाज को रास्ता दिखाया। समाज के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते हुए कुछ नियम बनाए। लेकिन मनुष्य की जाति ऐसी है कि जब तक भय न हो, तब तक नियम-कानून नहीं मानती। इसलिए धर्म-अधर्म का भय दिखाकर सभी नियम-कानूनों को पर्व-त्योहार बना दिया गया। यही हाल इस जेठ की एकादशी के साथ भी है।

ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के शरीर को केवल मांस और हड्डियों का ढाँचा नहीं माना, बल्कि उसमें यह देखा—

"छिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व रचि अधम शरीरा"

यही पाँच तत्व हैं जिनसे इस संसार के सभी जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, देव-दानव और मनुष्य बने हैं। इन पाँचों तत्वों में जल का बहुत-बहुत महत्व है। कहा जाता है कि मनुष्य के शरीर में लगभग 70 प्रतिशत पानी होता है। और इसी पानी के उतार-चढ़ाव से शरीर में अनेक प्रकार के रोग जन्म लेते हैं।

पुराने लोगों का यह विश्वास था कि चंद्रमा का प्रभाव इस पृथ्वी के जल पर पड़ता है। पूर्णिमा और अमावस्या के दिन समुद्र में ज्वार-भाटा का जोर अधिक रहता है। और इसी आधार पर उनका विचार था कि जब मनुष्य के शरीर में इतना पानी है, तो उसके मन और शरीर पर भी इसका प्रभाव अवश्य पड़ता होगा। वैदिक साहित्य में चंद्रमा और मन के संबंध का उल्लेख भी मिलता है—

"चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत।।"
(पुरुष सूक्त)

अर्थात् चंद्रमा उस विराट प्रकृति पुरुष के मन से उत्पन्न हुआ। इसी कारण मनुष्य के मन पर चंद्रमा के प्रभाव को जोड़ा जाता है। पश्चिमी दुनिया ने भी इस विषय पर बहुत लिखा है। लूनाटिक इफेक्ट और अपराध पर खूब चर्चा हुई है। इस समय अवसादग्रस्त और उन्मादी रोगियों की स्थिति बढ़ जाती है। आत्महत्या और हत्या के मामलों में वृद्धि हो जाती है। और इसके पीछे लूनाटिक इफेक्ट (पूर्णिमा के चाँद का प्रभाव) बताया गया।

कम से कम अवसाद, उन्माद और आत्महत्या जैसी स्थितियों पर हमारे पुरखों ने पहले से ही उपाय सोच रखे थे।

वैसे तो वर्ष में 24 एकादशी होती हैं और उतनी ही पूर्णिमा तथा अमावस्या भी। प्रतिपदा से लेकर पंद्रह दिनों तक चंद्रमा के गुरुत्व बल का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। दशमी से यह प्रभाव कुछ अधिक होने लगता है। पुराने लोगों ने इसी बात को पकड़ा और एकादशी का दिन चुना। बढ़ते गुरुत्वीय प्रभाव से शरीर के जलतत्त्व में होने वाले उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रखने के लिए एक दिन का पानी से परहेज, उपवास तथा पानी में पैदा होने वाले सभी प्रकार के अनाज, फल आदि से दूरी का विधान किया। यही सहज उपाय था, जिसका प्रभाव इतना था कि बिना हींग-फिटकरी के शरीर को लाभ पहुँचाए। बिल्कुल एक स्विच की तरह। एक दिन रोककर शरीर को संतुलित करना। लेकिन मनुष्य जब तक भय का भूत न देखे, तब तक कोई नियम-कानून नहीं मानता। इसलिए धर्म-कर्म, स्वर्ग-नरक की बातों के पीछे यह सारी वैद्यकीय समझ छिपा दी गई।

अब बात निर्जला एकादशी की...

इसमें भी वही बात है, बस नियम थोड़ा अधिक कठोर कर दिया गया है। अन्य एकादशियों में थोड़ा दूध, पानी या शरबत चल जाता है, लेकिन इसमें पानी भी नहीं पीना होता। निर्जल अर्थात बिना जल के। जेठ अर्थात गर्मी का चरम और मानसून की शुरुआत। वर्षा ऋतु में पानी से होने वाले अनेक प्रकार के रोग होते हैं। पेट की खराबी से लेकर तरह-तरह के चर्म रोग तक। और पुराने वैद्यक में किसी भी चीज की अति होने से पहले उसे रोकना एक अच्छा उपाय माना जाता था।

निर्जल रहने से शरीर कमजोर नहीं होता, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति अर्थात इम्युनिटी बढ़ती है। या यूँ कहिए कि सुप्त प्रतिरक्षा शक्ति जागृत हो जाती है, जो आने वाले मौसम में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखती है।

भारतीय संस्कृति की विशेषता यह रही कि उसने स्वास्थ्य से जुड़े अनेक सिद्धांतों को धार्मिक और सामाजिक आचरण के रूप में स्थापित कर दिया। इसी कारण करोड़ों लोग बिना वैज्ञानिक शब्दावली को जाने-समझे भी नियमित उपवास, संयम और आत्मनियंत्रण का अभ्यास करते रहे।

यदि एकादशी को केवल धार्मिक कर्मकांड न मानकर शरीर को विश्राम देने, मन को स्थिर करने, भोजन पर नियंत्रण रखने और आत्मचिंतन का अवसर माना जाए, तो उसका महत्व आज भी उतना ही है जितना हजारों वर्ष पहले था।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि एकादशी केवल श्रद्धा का विषय नहीं है, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को बनाए रखने वाली एक प्राचीन भारतीय परंपरा भी है। चाहे इसे चंद्रमा के प्रभाव के संदर्भ में देखा जाए या स्वास्थ्य-अनुशासन के रूप में—इसका मूल संदेश एक ही है—

"संयम, संतुलन और सजगता।"

 

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