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"मेरे अंतर का ज्वार, जब कुछ वेग से उफ़न पड़ता है,
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
साहित्य के क्षेत्र में मेरा ये प्रारंभिक कदम है, अपने टिप्पणियों से मेरा मार्ग दर्शन करें |

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

सुभाष, हम शर्मिंदा हैं


आज पढ़ा समाचार में,

घटना संसद के सेन्ट्रल हाल में 
मातम मन रहा था 
आजादी के नायक का 
जयंती थी आज जिसकी 
राष्ट्र के अधिनायक का 
हाय सुभाष तुम्हे नमन 
क्षमाप्रार्थी हैं, हम हतभागे हैं
भूल गए हैं तुम्हे हम 
नींद हमारी गहन, हम कब जागे हैं 

धिक्कार तुम्हे है नेताओं 
जो तुम उस नेता को भूल गए 
मर चुकीं तुम्हारी आत्माएं 
तुम आजादी के प्रणेता को भूल गए 
धिक्कार तुम्हारी माताओं को
धिक्कार तुम्हारे कुल को है 
माँ भारती का धिक्कार लगे 
धिक्कार तुम्हारे समूल को है 

दुर्भाग्य देश का जग गया है 
सुप्त हो चूका जनजन का खून 
गिद्ध भेड़िये शीर्ष पर बैठे 
तेरे इस देश में लग चूका घुन 
हाँ अगर अल्पसंख्यक या 
पिछड़ी जाती का नाम जुड़ा होता 
तो सजा होता ये सेंट्रल हाल 
और तेरी तस्वीर पर माला पड़ा होता 
व्यर्थ गया बलिदान तुम्हारा 
काश तुम रक्त ना बहाए होते 
तब सुकून तुम्हे रहता 
आज अपनी जन्मदिवस यूँ अकेले ना मनाये होते | 
-शशि 24-01-2014
(23जनवरी 1897 को जन्मे इस महान क्रांतिकारी और हमारे प्रिय नेताजी की जयंती पर, हमारे 775 सांसदों की नींद नहीं टूटी | धिक्कार है इन नेताओं पर जो देश के शीर्ष पर बैठ हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान कर रहे हैं | 

गुरुवार, 3 मई 2012

मुझे संभालो मेरे गुरुवर


मेरी टूटती साँसों को दिया जब सहारा
मेरी डूबती नईया को मिल गया किनारा

तुम ही तो चल रहे संग मेरे हर कदम
सन्मार्ग को दिखा दो भटके कभी ना हम

फिर से मुझे संभालो,मुझको गले लगा लो
अंधकार फिर बढ़ा है रोशन जहाँ बना दो

भटकूँ न अपने मन से, खुश रहूँ जीवन से
बस दूर तुम न करना मुझको अपने चरण से
~शशि (०३ मई २०१२, वीरवार)

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

धोनी भयंकर




धोनी भयंकर, धोनी भयंकर
हमरे ...
धोनी भयंकर, धोनी भयंकर
धोनी ने धोया लंका को जमकर
धोनी भयंकर...

धोनी के धुरंधर सचिन तेंदुलकर
हरभजन का दूसरा, जहीर का योर्कर
युवराज तो ऐसे जैसे कलंदर
धोनी भयंकर, धोनी भयंकर
हमरे ...
धोनी भयंकर, धोनी भयंकर

गोरों* को धोया
हरामखोरों** को धोया
चोरों*** को पीटा मैदान में जमकर
धोनी भयंकर, धोनी भयंकर
हमरे ...
धोनी भयंकर, धोनी भयंकर

(* गोरों- आस्ट्रेलिया,
** हरामखोरों-पाकिस्तान,
*** चोरों- सीता माता को चुरानेवाले रावण के वंशज)

मंगलवार, 29 मार्च 2011

महामृत्युंजय मंत्र का शाब्दिक अर्थ

त्रयम्बक -तीन आँखोवाले जो संहारक हैं, महाकाल हैं, कैसे मृत्यु से मुक्त कर सकते हैं ? जब जब उनकी तीसरी आँख खुली है संहार हुआ है | फिर इस त्र्यम्बक की यजामह अर्थात आराधना क्यूँ?



आज शिवरात्रि है | भूतेश्वर भगवान शिव के लिंग रूप में प्रादुर्भाव की रात्रि | भुक्ति और मुक्ति का समायोजन की रात्रि | मन आह्लादितहै, व्रत-उपवास रखा है | "उपवास" अर्थात उप वास, अर्थात सानिध्य | शिव का सानिध्य का अवसर कैसे छोड़ सकता हूँ | सो उपवास किया है |
सुबह दैनिक क्रम में शिव का सानिध्य रहा | प्रातः मोबाइल का अलार्म महामृत्युंजय बजाया | अंतरात्मा शिव शिव हो गयी | फिर कंप्यूटर पर शिवमहिम्न स्तोत्रं और रावणकृत शिव तांडव स्तोत्रं का का पाठ एस० पि० बालासुब्रमण्यम की आवाज में सुना | सस्वर पाठ मैं भी करता रहा |
मगर जब स्वयं पूजा के लिए बैठा तो मन महामृत्युंजय मंत्र के भावार्थ पर जा अटका | मंत्र चिंतन भी एक पूजा है | बस लग गया भावार्थ ढूंढने में |
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्‌। उर्व्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योरमुक्षीय मामृतात्‌।
(भावार्थ-समस्त संसार के पालनहार तीन नेत्रों वाले शिव की हम आराधना करते हैं | विश्व में सुरभि फैलानेवाले भगवान शिव हमे मृत्यु ना की मोक्ष से हमें मुक्ति दिलायें)

इस मंत्र ने मुझे और मेरे विचारों को उद्वेलित कर दिया था | आखिर हिन्दी में जो भाव बताया गया है, इस की गहराई क्या है ?
त्रयम्बक -तीन आँखोवाले जो संहारक हैं, महाकाल हैं, कैसे मृत्यु से मुक्त कर सकते हैं ? जब जब उनकी तीसरी आँख खुली है संहार हुआ है | फिर इस त्र्यम्बक की यजामह अर्थात आराधना क्यूँ?
मृत्यु सत्य है, फिर इससे बचने के लिए, मृत्यु को अपने से दूर रखने का प्रयास क्यूँ? इसके लिए महाकाल की प्रार्थना क्यूँ? कहीं ये चापलूसी तो नहीं !!!??? गंभीर प्रश्न था जो मुझे उद्विग्न कर रहा था | फिर अचानक "हुई सहाय शारद मैं जाना" , पिताजी की कुछ बातें याद पड़ीं | आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं, उनके द्वारा चिकित्सा के क्रम में कुछ चर्चाएँ भी होती थीं | उन्ही चर्चाओं के कुछ शब्द मेरे अन्तः मन से निकल पड़े और भावार्थ सूझ गया |
हमारे शरीर के तीन तत्व वात-पित्त-कफ का सामजस्य ही हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है | यह आयुर्वेद का मत है | इनके असंतुलन होने पर शरीर में व्याधियां होती हैं | यही वात-पित्त और कफ हमारे शरीर के सुगन्धित धातुओं (रक्त, मांस और वीर्य) का पोषण और पुष्टि करते हैं | अगर ये धातु शरीर में पुष्ट हैं तो जरा-व्याधियां नहीं सताती |
मुझे अर्थ मिल गया था-
हम भगवान शिव की आराधना करते हैं , वो हमारे शरीर के तीनों तत्वों (वात-पित्त-कफ) के संतुलन से उत्पन्न सुगन्धित धातुओं(रक्त-माँस-वीर्य) की पुष्टि करें | जिससे हमें मृत्यु नहीं(मृत्यु सत्य है), बल्कि जरा-व्याधियों के भय से मुक्ति मिले |

रोज सुबह महामृत्युंजय मंत्र का जाप करता रहा | मगर कभी इसके भावार्थ पर नहीं सोचा | शिव की बाह्य प्रतिमा बना बस जाप करता रहा | मगर जब से इस गुह्य भाव को समझा है | ह्रदय शिव के सानिध्य में और जा रहा है | अपने शरीर में विद्यमान शिव को पहचान लिया है |
शिव के त्रिनेत्र हमेशा अधमुंदे दिखाए गए हैं | साम्य-सौम्य की प्रतिमूर्ति शिव जब रौद्र रूप धारण करते हैं तो त्रिनेत्र खुल जाते हैं | उनमे असंतुलन आ जाता है | फिर शिव संहारक बन शव की ढेर लगा देते हैं | अर्थात संसार का विनाश संभव हो जाता है | यही हाल शरीर का भी है, अगर वात-पित्त-कफ संतुलित हैं तो आप स्वस्थ हैं | अन्यथा इनके असंतुलन से व्याधियां आ सकती हैं और मृत्यु भी निश्चित है|
शिव जब शांत होते हैं तो काल कूट हलाहल का भी शमन कर लेते हैं | वही हाल इस शरीर रूपी शिव का भी है | जब स्वस्थ है, संतुलित है तो यह भी बाह्य विषाणुओं का शमन कर लेता है |
इस महाशिवरात्रि भगवान शिव से यही प्रार्थना है की समस्त मनुष्यों के शरीर में विद्यमान शिव की उर्जा को उर्ध्व गति दें | जिससे उनमें मृत्यु का भय समाप्त हो सके |

(दिल्ली, महाशिवरात्रि)

गुरुवार, 17 मार्च 2011

ये कैसा तांडव इस फाल्गुन में....

हे नटराज ! ये कैसा तांडव,

भंग के उमंग में

धरती डोली, सागर उफना

कुछ अलग तरंग में


चिलम कि तेरी आग बुझी तो

बडवानल बुला लिया

धूनी कि पड़ी राख कम तो

सारा शहर जला दिया


काम दमन करने वाले,

इस फाल्गुन में क्यूँ बौराये

कैलास का मंच क्या कम था

जो जापान में जा समाये


काल कूट को पीने वाले

क्या अब विष पचा ना पाए

क्या डगमगा गए तांडव में,

जो सुर ताल रचा ना पाए

~शशि(१७मार्च २०११)

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

कुत्ते हैं आवाम का

(आज देश की हालत ये है कि हर नुक्कड़ पर के आवारा दोपाये अपने आपको नेता समझ बैठे हैं, देश के शीर्ष भवन में बैठ ये विभिन्न सुरों में भौंकते हैं | इस तस्वीर को देश समझें और टूटते झोपडी को देश का संसद...)

इस कविता/व्यंग्य का भाव दोपायों के लिए है | चौपायों से क्षमाप्रार्थी हूँ उनकी इस बेइज्जती के लिए... ~शशि

तस्वीर : फ्लिकर डाट नेट

हाँ ! यहाँ भी कुत्ते भौंकते हैं

हर समस्या पर चौंकते हैं,
साम्यवादी कुत्ते हैं
परम्परावादी कुत्ते हैं
अन्दर कि बात यही है
अवसरवादी कुत्ते हैं
इनमे भी सगोत्रीय की जंग है
यहाँ भी वर्णभेद का रंग है
कबीरा भी था कुतिया राम का
हम भी कुत्ते हैं आवाम का
हम भी समस्याओं पर चौंकते हैं
जी जान लगाकर एक सुर में भौंकते हैं

~शशि रंजन मिश्र (२३/०२/२०११)


सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

लंगड़े कुत्ते का भाषण



बड़े-बड़े दरबारों में दुम हिलाया है

मालिकों के मलाईदार जूठे को खाया है

भौंक-भौंक कर किया कपालभाति

कभी लेट कर किया वज्रासन

लंगड़े कुत्ते का भाषण


देश दुनिया घूम कर आया है

पश्चिम में पूरब ढूंढ कर आया है

साधू की तरह ज्ञानी हो गया

मांस भक्षण में भी गो ग्रासन

लंगड़े कुत्ते का भाषण


दो चार कुत्तों को चेला है बनाया

चौराहे पर भौंक जयकार मनाया

मुहल्ले की बिल्लियों को हड़काकर

मजबूत कर रहा अपना शासन

लंगड़े कुत्ते का भाषण


अपने लंगड़ेपन को खद्दर में छुपाया

सफ़ेद चोले में मन के कालेपन को छुपाया

गांधी-नेहरु की बातों का गुढ़ सार

चौपाल लगा सस्वर करता उच्चारण

लंगड़े कुत्ते का भाषण


प्रजातांत्रिक कुत्ता है,

साम्राज्यवादी हो गया

देशभक्त का चोला फेंक अवसरवादी हो गया

असंसदीय बातों को संसद में भौंक भौंक

दूसरे कुत्तों को सिखा रहा अनुशासन

लंगड़े कुत्ते का भाषण


रविवार, 26 सितंबर 2010

भ्रष्टमंडल खेल

राष्ट्रमंडल खेल अब है नजदीक आयो, दिल्ली संग हुयी दिल्लगी भारी है
आन बान शान पे ना दाग लगने पाए, ओखरी में सर देना ही लाचारी है
कास१ के उछास पे चमके हैं रणवीर, मति के गति पे कैसी छाई खुमारी है
हीराकुंड उफने है यमुना को गया लील, शांत कालिंदी अब तो हाहाकारी है

दशा देख दिल्ली की रण छोडे सुरमा भी, देश के विकास में गतिरोध डाली है
गढ्ढा है या रोड है कुछ मतिभ्रम सा है, हो गए अरबों खर्च अब जेब खाली है
अठाईस हजार करोड फूंक दिए खेल में, भूखी नंगी जनता अब तो सवाली है
कागज़ के घरौदों से बरसात कैसे रुके, घनघोर वृष्टि में कैसो मनत दिवाली है

लालबत्ती गाडी का गुमान सबको है भरा, जनता तो खिंच रही बैलगाडी है
कहीं नदी बहती पैसे की बेकल बन, और कहीं चूल्हा बंद जेब सुखाडी है
सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा है गूंगा राजा, पथभ्रष्ट मंत्री ही उसके अगाडी है
भारी बोली लगी थी दौड में जिसपे , पोल है अब खुली लंगड़ा खिलाड़ी है

दिल्ली की सीमा बस संसद से खेलगांव, बाकी तो विदेशी अतिक्रमणकारी हैं
औद्योगिक क्षेत्र भी विकासहीन अछूते हैं, आवासीय क्षेत्रों में फैली महामारी है
वृष्टि की कहीं मार पड़ी है भयंकर, कहीं टायफाइड डेंगू की बढती बीमारी है
अब तो जनता है अनुगत देव चरणों में, त्राहिमाम त्राहिमाम रहत पुकारी है

हर पांच बरस जिस पुष्पलता को है सेवत, बस भ्रम में पालत कंटकारी२ है
धन्य है ये देव भूमि और ये जनता, सहनशीलता क्या खूब ह्रदय में धारी है
लोकतंत्र है मृत राजतंत्र के सामने, जनता का बस सिर धुनना जारी है
देख दशा देश की ‘शशि’ भी है मलिन, राहू का त्रास ही इसका आधारी है

(१. कास-काषार्पण/चांदी के सिक्के २. कंटकारी- रेंगनी/काँटों की एक झाडी)