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"मेरे अंतर का ज्वार, जब कुछ वेग से उफ़न पड़ता है,
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
साहित्य के क्षेत्र में मेरा ये प्रारंभिक कदम है, अपने टिप्पणियों से मेरा मार्ग दर्शन करें |

शनिवार, 28 मार्च 2009

नेता जी का इमोशनल अत्याचार

चुनाव का त्योहार,
देश का बंटाधार |
वादों का ले पिटारा,
ईमोसनल अत्याचार |
आधारहीन जनतंत्र,
त्रिशंकु जनाधार |
झूठी कसमे झूठे वादे
और घोषणा निराधार |
उजला कपड़ा
तन से है जकड़ा ,
जिह्वा शहद
और नत मस्तक,
मन में छुपा
पैनी तलवार |
दल बदल
और खींचातानी
पैसा बहता
जैसे पानी|
देश की तबाही
पर रो रहे हैं,
सफ़ेदपोश
घड़ियाल |

2 टिप्‍पणियां:

  1. रो रहे घड़ियाल,
    ये जान के भी हम है अंजान,,,,
    कब तक सहिष्णुता के आड़े अपनी कमज़ोरी च्छूपाते फिरेंगे...
    अब समय है जब दे सही जनादेश, जो हो जान के लिए और देश के लिए...

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  2. वाह ! बहुत सही व्यंग्य किया है..हर शब्द वास्तविकता से परिपूर्ण है.

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