स्वागतम

"मेरे अंतर का ज्वार, जब कुछ वेग से उफ़न पड़ता है,
शोर जो मेरे उर में है,कागज पर बिखरने लगता है |"
ये अंतर्नाद मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है, जिसे मैं यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ |
साहित्य के क्षेत्र में मेरा ये प्रारंभिक कदम है, अपने टिप्पणियों से मेरा मार्ग दर्शन करें |

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

मेरी पहचान....


अन्वेषण स्वयं का
जैसे
अनंत शून्य में भटकना
क्या सत्य है मेरा ,
या कोई मिथ्या
अंतरद्वंद या छलावा
मैं बुद्ध नहीं
महावीर भी नहीं हूँ
जो संसार के कष्टों से भाग चलूँ |
नहीं बैठ सकता कंदराओं में ,
वृक्षों के नीचे
और करूँ अन्वेषण
सत्य का
कष्टों से मुक्ति का |
खुद को ही सहेजना
सुलझाने की जगह
जीवन के जटिलता का |
यह अपराध है
जो मैं नहीं कर सकता |
मैं बंद पड़ी गांठों
को खोलता हूँ
अपनी असमर्थ अँगुलियों से |
मेरा सत्य
यहीं बंद है |
मेरे अंतर के माया-जाल
की कुंजी यहीं बंधी है |
बस गांठें खोल लूँ |
मैं ब्रम्ह हूँ
आभास मुझे है
मैं स्वयं सृष्टी हूँ
फिर क्यूँ
ये अंतर्द्वंद
ये विचारों का मंथन ,
कुछ अनुतरित सा हो जाता हूँ |
जब कोई करता है
मेरा अन्वेषण |

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hin khubsurat rachna thi aapki, waise sari rachnaon mein ek ahsas sa chipa tha , par kuch achhe lage jisme..............
    meri pahchan......., aur nirjhar ban jane de aur dongh kafi achhi lagi...........

    bahut khubsurat

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